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नाम जप क्यों छूट जाता है? क्या यह कृपा रुकने का संकेत है?

Last Updated on 2 months ago by Team Trending Bharat

जब भक्ति में भाव सूख जाए तो क्या भगवान दूर हो जाते हैं?

कभी-कभी मन एकदम अजीब सा खाली हो जाता है ना शांति… ना अशांति बस एक सूना-सा मौन और वही नाम, जो कभी हर सांस में गूंजता था अचानक अब जैसे चुप हो गया हो॥ आरती सामने चल रही है.. माला हाथ में घूम रही है.. पर भीतर कुछ भी नहीं उठता

और तभी डर जन्म लेता है “ कहीं भगवान मुझसे रूठ तो नहीं गए? ”

अगर आपने कभी ये महसूस किया है तो यकीन मानिए-आप अकेले नहीं हैं……..बहुत से साधक इसी सवाल से जूझते हैं कि नाम जप क्यों छूट जाता है और क्या यह ईश्वर की कृपा कम होने का संकेत है

जब नाम जप अचानक फीका पड़ने लगे

एक साधक था जो सालों तक हर सुबह दीपक माला और नाम निरंतर जपता था .. हर मंत्र के साथ आंखें भीग जातीं.. कमरा शांति से भर जाता.. जैसे ईश्वर खुद सामने बैठा हो.. फिर एक दिन.. माला हाथ में थी.. दीपक जल रहा था.. लेकिन भीतर कुछ भी नहीं था .. जिन शब्दों के वगैर उनका जीवन अधूरा था वह शब्द बोझ लगने लगे थे और सारे भाव सूख गए थे उनको डर लगा
क्या मेरी साधना खत्म हो गई?

यहीं सवाल आया- नाम जप क्यों छूट जाता है?

क्या नाम जप छूटना ईश्वर की कृपा रुक जाना है?

यही सवाल लेकर वो साधक परमहंस योगानंद जी के पास पहुंचा “ गुरुदेव…अब मन जप में नहीं लगता-क्या भगवान मुझसे नाराज़ हैं? ”

योगानंद जी मुस्कराए

“ कृपा कभी घटती नहीं बेटे,
बस उसका रूप बदल जाता है ”

योगानंद जी क्या समझाते हैं?

उन्होंने कहा-शुरुआत में भगवान भाव आनंद और अनुभूति देते हैं ताकि साधक रुका रहे लेकिन जब साधक थोड़ा परिपक्व हो जाता है तो वही अनुभूतियां धीरे धीरे हटा ली जाती हैं

क्यों?

👉 ताकि साधक भाव पर नहीं
👉 ईश्वर पर टिके


क्या ये परीक्षा है या दंड?

योगानंद जी साफ कहते हैं

“जब जप में मन न लगे,
ये दंड नहीं
गहराई की तैयारी है”

यहीं से शुरू होती है
बाहरी जप से भीतर के मौन जप की यात्रा


जब मौन ही जप बन जाता है

जब शब्द थक जाए और भाव साथ छोड़ दें तब भी साधना में बैठो नाम आए या न आए कोई फर्क नहीं

योगानंद जी कहते थे

“ जब तुम मौन में बैठते हो, तुम्हारा मौन ही जप बन जाता है ”

यही वो क्षण है जब आप मंत्र नहीं करते बल्कि मंत्र आपको थाम लेता है


आखिर नाम जप क्यों छूट जाता है?

अहंकार की परत गलाने के लिए “ मैं कुछ कर रहा हूँ ” इस भाव को तोड़ने के लिए और अनुभूति आधारित भक्ति से प्रेम-आधारित भक्ति तक ले जाने के लिए – शब्द से नाद की ओर/ प्रयास से समर्पण की ओर

नाम जप क्यों छूट जाता है?
इसका उत्तर हमेशा परीक्षा या दंड में नहीं होता/ बल्कि आध्यात्मिक गहराई में छिपा होता है


जब मन जप से भागे, तब क्या करें?

योगानंद जी का सरल उपाय

अगर शब्द न आएं तो सांस को ही मंत्र बना लो श्वास-: प्रभु निश्वास-: धन्यवाद बस इतना काफी है और डर लगे तो सिर्फ इतना कहो

“ प्रभु मैं लौट आया हूँ ”


‘मौन जप’ के फायदे और चुनौतिया

फायदे

  • मन को गहरी शांति मिलती है।
  • अहंकार पिघलने लगता है।
  • कम कोशिश में भी गहरा अनुभव मिलता है।
  • जप सांसों में रच-बस जाता है।

चुनौतियां

  • शुरुआत में खालीपन और डर लगता है।
  • ऐसा लगता है, भक्ति खत्म हो रही है।
  • मन बार-बार भटकता है।

पर सच ये है

जहाँ तुम्हें लगता है कुछ नहीं हो रहा
वहीं भगवान सबसे ज़्यादा काम कर रहे होते हैं


क्या भगवान दूर हो गए हैं?

भगवान सूरज की तरह हैं हमेशा चमकते हैं दूरी मन की होती है कृपा की नहीं

अंत में…

जिसे साधक ने “ नाम जप छूट जाना ” समझा असल में वो होठों से उतरकर दिल की धड़कन में बस गया थाजप छूटना अंत नहीं आत्मा की नई उड़ान है


आज से ये तीन बातें आज़माइए

रोज़ 10 मिनट बस चुप बैठिए सांस को मंत्र बना लीजिए डर लगे तो कहिए.. “ प्रभु मैं लौट आया हूँ ”

मेरा नजरिया (My Point of View) ऑन नाम जप क्यों छूट जाता है?

अगर भक्ति में भाव नहीं रहा, तो क्या हमारी साधना अधूरी हो गई?
मेरा व्यक्तिगत नजरिया इस विषय पर थोड़ा अलग है- मुझे लगता है कि भाव का सूखना भक्ति की असफलता नहीं बल्कि उसका स्तर बदलना है

जब कोई व्यक्ति शुरुआत में नाम-जप या पूजा करता है- तो भावनाएं बहुत तेज़ होती हैं – आंसू, शांति, रोमांच, अपनापन। ये phase बहुत सुंदर होता है- लेकिन यही अगर हमेशा चलता रहे तो साधक भावों पर निर्भर हो जाता है। इस लेख की असली ताकत मुझे यहीं दिखती है कि यह हमें समझाता है — ईश्वर भाव नहीं, चेतना हैं

Real-life context में देखें तो बिल्कुल ऐसा ही हमारे रिश्तों में भी होता है- शादी के शुरुआती सालों में excitement और emotions बहुत होते हैं लेकिन समय के साथ रिश्ता गहराता है शांत होता है। इसका मतलब ये नहीं कि प्रेम खत्म हो गया – बल्कि वो mature हो गया है। भक्ति में भाव का सूखना भी कुछ ऐसा ही है।

एक तरफ- अगर साधक पूरी तरह आलसी हो जाए, जप छोड़ दे और इसे “मौन जप” कहकर justify करे – तो ये आत्म-भ्रम हो सकता है। दूसरी तरफ अगर कोई जबरदस्ती भाव पैदा करने की कोशिश करे guilt में जिए कि “मेरे अंदर कुछ गलत हो गया है” – तो वो भी नुकसानदायक है। मेरे अनुसार सही रास्ता इन दोनों के बीच है – अनुशासन बना रहे, लेकिन अपेक्षा खत्म हो जाए

आज के समय में, जब anxiety और overthinking बहुत बढ़ गई है यह दृष्टिकोण बेहद उपयोगी है। Silent devotion, breath based awareness, और बिना expectation के बैठना – ये practices आने वाले समय में spirituality को और practical बनाएंगी। खासकर युवाओं के लिए जो emotional highs से जल्दी थक जाते हैं।

मेरा नजरिया इस पूरे विषय पर यही है कि भगवान की दूरी का एहसास अक्सर हमारे भीतर की शांति की परीक्षा होता है। जहां हमें लगता है “कुछ नहीं हो रहा”, वहीं शायद भीतर बहुत गहराई से कुछ घट रहा होता है..

अंत में- एक thought जो मैं आपके साथ छोड़ना चाहता हूं

अगर भक्ति शोर से मौन की ओर जा रही है, तो डरने की नहीं, ठहरने की ज़रूरत है।
क्योंकि कभी कभी भगवान आवाज़ में नहीं खामोशी में सबसे पास होते हैं

ये मेरा व्यक्तिगत नजरिया है, कोई आधिकारिक आध्यात्मिक सलाह नहीं।

लेखक: अरविंद

अरविंद एक अनुभवी आध्यात्मिक मार्गदर्शक और विशेषज्ञ सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियर हैं… जो जीवन के आंतरिक और बाहरी आधारों को जोड़ने का एक अनूठा दृष्टिकोण लाते हैं…

अनुभव एवं विशेषज्ञता:

  • आध्यात्मिकता एवं ध्यान-: उन्हें ध्यान (मेडिटेशन) और आध्यात्मिक अभ्यास के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहन…व्यक्तिगत अनुभव प्राप्त है.. वे इस विषय पर पहले से ही प्रतिष्ठित संस्थाओं के लिए नियमित रूप से ज्ञानवर्धक लेख लिखते रहे हैं।
  • सिविल इंजीनियरिंग-: उनके पास सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का सक्रिय व्यावहारिक अनुभव है/ जो निर्माण… परियोजना प्रबंधन…. गुणवत्ता नियंत्रण और रखरखाव जैसे पहलुओं को कवर करता है….

प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता:

Trending Bharat टीम के सदस्य के रूप में/ अरविंद अपने लेखन में जटिल आध्यात्मिक अवधारणाओं को आधुनिक/ व्यस्त जीवनशैली के साथ सामंजस्य बिठाते हुए/ उन्हें व्यावहारिक एवं सुलभ बनाते हैं… उनकी सिविल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि एक तार्किक, समाधान—-उन्मुख दृष्टिकोण प्रदान करती है… जिससे उनकी सामग्री विश्वसनीय और जमीन से जुड़ी रहती है.. उनका उद्देश्य पाठकों को ऐसा ज्ञान प्रदान करना है जो न केवल विचारोत्तेजक हो, बल्कि जीवन में उपयोगी भी हो..

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