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Ambedkar Gandhi BBC Interview 1955 – Rare BBC Archive Insight

Last Updated on 2 months ago by Team Trending Bharat

कभी ऐसा महसूस हुआ है कि हम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को सिर्फ़ एक तयशुदा छवि के ज़रिये जानते हैं-बिना यह समझे कि उसके समकालीन उसे कैसे देखते थे? डॉ. भीमराव आंबेडकर का 1955 का BBC इंटरव्यू ठीक उसी जगह हमें रोकता है..

यह एक सीधी बातचीत है- जहाँ आंबेडकर महात्मा गांधी को किसी प्रतीक की तरह नहीं- बल्कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह देखते हैं.. यह लेख झूठी कहानी गढ़ने के लिए नहीं है- बल्कि अभिलेखीय आवाज़ को साफ़/ ज़िम्मेदार रूप में प्रस्तुत करना है- बिना कुछ जोड़े- बिना कुछ घटाए


Bhimrao Ambedkar’s iconic interview from 1955 | Archives | BBC News India

“मैंने गांधी को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा” – Ambedkar Gandhi BBC Interview

क्योंकि मैं उनसे एक विरोधी के रूप में मिला- जो लोग उनके पास भक्त की तरह जाते थे उन्हें वही दिखाई देता था जो वे दिखाना चाहते थे..

..महात्मा का बाहरी रूप..

लेकिन मेरे सामने उन्होंने अपने असली दाँत खोले..

आंबेडकर कहते हैं कि उन्होंने गांधी को एक मनुष्य के रूप में देखा- बिना आभामंडल के/बिना प्रतीक के – इसी कारण उन्हें लगता है कि वे गांधी को उस रूप में समझ पाए जैसा बहुत कम लोग समझ सके..

उनका मानना था कि भक्ति के साथ मिलने पर नेता की गढ़ी हुई छवि दिखती है- जबकि विरोध में मिलने पर व्यक्ति का वास्तविक रूप सामने आता है..

पश्चिमी दृष्टि और गांधी-Ambedkar Gandhi BBC Interview

आंबेडकर : मुझे यह हैरानी भरा लगता है- मैं समझ नहीं पाता कि पश्चिमी दुनिया गांधी में इतना क्या देखती है.. भारत के संदर्भ में मेरे अनुसार- वे इतिहास का एक एपिसोड थे

कोई युगनिर्माता नहीं

उनका मानना है कि गांधी की स्मृति भारत में स्वाभाविक रूप से जीवित नहीं है.. वह इसलिए बनी रहती है क्योंकि कांग्रेस पार्टी हर साल छुट्टियाँ आयोजन और समारोह करती है..

अगर ये कृत्रिम सहारे न हों तो लोग उन्हें कब का भूल चुके होते..

क्या गांधी ने समाज को बदला? Ambedkar Gandhi BBC Interview

आंबेडकर : बिल्कुल नहीं- वे लगातार दोहरा खेल खेलते रहे

वे बताते हैं कि गांधी दो तरह की पत्रिकाएँ चलाते थे-
एक अंग्रेज़ी में – जैसे हरिजन और उससे पहले यंग इंडिया..

दूसरी गुजराती में..

अंग्रेज़ी पत्रों में वे जाति प्रथा और untouchability के विरोधी दिखाई देते थे और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते थे..

लेकिन गुजराती लेखन में- आंबेडकर के अनुसार.. वे एक कट्टर परंपरावादी हिंदू के रूप में सामने आते हैं- वही धर्मशास्त्र और रूढ़ियाँ जिन्होंने सदियों तक भारत को जकड़े रखा..

यहीं से बातचीत का केंद्रीय तनाव साफ़ होता है – एक सार्वजनिक छवि और एक आंतरिक संदेश के बीच का अंतर

अनुसूचित जातियाँ : असली मुद्दा क्या था?

आंबेडकर : हमारे लिए दो बातें ज़रूरी थीं.. untouchability का ख़ात्मा-और समान अवसर.. केवल छुआछूत मिटा देना काफ़ी नहीं था..

वे कहते हैं कि सदियों से untouchability चली आ रही थी. असली समस्या यह थी कि समाज में बराबरी का दर्जा नहीं था.. ऊँचे पदों तक पहुँच नहीं थी.. ऐसे स्थान नहीं थे जहाँ से लोग अपने समाज की रक्षा कर सकें..

आंबेडकर के अनुसार- गांधी इन बातों के पूरी तरह विरोधी थे.. वे मंदिर प्रवेश जैसे प्रतीकों तक ही सीमित थे-जिसे वे निरर्थक मानते हैं/ क्योंकि इससे जीवन की वास्तविक स्थिति नहीं बदलती

मंदिर, ट्रेन और गाँव की हक़ीक़त

क्या प्रतीकात्मक बदलावों से कुछ फ़र्क़ पड़ा?

आंबेडकर : नहीं- मंदिर में जाने से जीवन नहीं बदलता.. गाँव में आप वही रहते हैं.. वही बस्तियाँ/ वही सीमाएँ..

वे इस बात को उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं कि समाज में बदलाव अचानक नहीं आता- बल्कि धीरे-धीरे और सीमित दायरों में प्रवेश करता है..

एक समय ऐसा भी था जब अलग-अलग जातियों के लोगों के लिए ट्रेन में साथ यात्रा करना तक वर्जित माना जाता था.. सामाजिक रूढ़ियाँ इतनी कठोर थीं कि एक ही डिब्बे में बैठना भी “ अपवित्र ” समझा जाता था..

फिर समय बदला- कानून बने/ शहरों का विस्तार हुआ/ शिक्षा और रोज़गार ने लोगों को मजबूरी में ही सही एक दूसरे के पास ला खड़ा किया.. ट्रेन के डिब्बों में लोग साथ बैठने लगे साथ सफ़र करने लगे एक ही पानी के नल से पानी पीने लगे.. यात्रा के दौरान ऐसा लगता था मानो समाज सचमुच आगे बढ़ रहा है और पुराने भेदभाव टूट रहे हैं..

लेकिन वे यह भी बताते हैं कि यह बदलाव अक्सर सिर्फ़ यात्रा तक सीमित रह जाता था.. जैसे ही लोग अपने अपने गाँव लौटते- वही पुरानी दीवारें फिर खड़ी हो जातीं.. गाँव की चौखट पार करते ही जाति/ ऊँच नीच और छुआछूत के नियम दोबारा लागू हो जाते- जो लोग ट्रेन में साथ बैठे थे वही लोग गाँव में अलग रास्तों से चलते अलग कुओं से पानी भरते और एक दूसरे से दूरी बनाए रखते..

इस उदाहरण के ज़रिए वे समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करते हैं जहाँ सार्वजनिक और आधुनिक जगहों पर समानता स्वीकार कर ली जाती है लेकिन निजी और पारंपरिक जीवन में पुरानी सोच जस की तस बनी रहती है.. उनका कहना है कि असली सामाजिक परिवर्तन तब होगा जब यह बराबरी सिर्फ़ ट्रेन की यात्रा तक नहीं बल्कि गाँव की गलियों और घरों की दहलीज़ तक पहुँचेगी..

गांधी: सुधारक या राजनेता?

आंबेडकर : वे एक कट्टर हिंदू थे/ कभी सुधारक नहीं.. उनमें कोई गतिशीलता नहीं थी..

उनके अनुसार छुआछूत पर चर्चा या उसके ख़िलाफ़ चलाए गए अभियानों के पीछे कोई व्यापक सामाजिक या नैतिक परिवर्तन की भावना नहीं थी.. इसका उद्देश्य बहुत सीमित और व्यावहारिक था..

पहला उद्देश्य यह था कि अनुसूचित जातियों को कांग्रेस के राजनीतिक मंच से जोड़ा जाए ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिल सके- उन्हें लगता था कि छुआछूत का मुद्दा उठाकर कांग्रेस ने इन समुदायों का विश्वास जीतने और उन्हें अपने साथ खड़ा करने का प्रयास किया..

दूसरा उद्देश्य यह था कि अनुसूचित जातियाँ स्वराज आंदोलन का विरोध न करें या उससे अलग कोई स्वतंत्र राजनीतिक दिशा न अपनाएँ- यदि वे आंदोलन से असंतुष्ट होकर विरोध में खड़ी होतीं तो इससे कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन की एकता पर असर पड़ सकता था..

इन दोनों कारणों से आगे- उन्हें इसमें किसी गहरे सामाजिक सुधार या सच्ची समानता की प्रतिबद्धता का अभाव दिखाई देता है- उनके अनुसार- यदि उद्देश्य वास्तव में छुआछूत के पूर्ण उन्मूलन का होता तो यह मुद्दा केवल भाषणों या आंदोलनों तक सीमित न रहकर सामाजिक ढाँचे की जड़ों तक पहुँचा होता..


क्या आज़ादी गांधी के बिना आ सकती थी?

आंबेडकर : हाँ- शायद धीरे-धीरे/ लेकिन बेहतर तरीक़े से

वे मानते हैं कि अगर सत्ता का हस्तांतरण चरणों में होता- तो हर समुदाय को खुद को मज़बूत करने का समय मिलता.. अचानक आई आज़ादी ने लोगों को तैयार नहीं किया..

अंग्रेज़ों का निर्णय : क्यों और कैसे?

फिर आज़ादी अचानक कैसे मिली?

आंबेडकर बताते हैं कि इसके पीछे दो बातें थीं-

पहली- सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित राष्ट्रीय सेना- जिसने ब्रिटिश सत्ता के उस भरोसे को तोड़ा कि भारतीय सैनिक कभी विद्रोह नहीं करेंगे..

दूसरी- ब्रिटिश सैनिकों की असंतुष्टि और सेना का dissolution..ब्रिटेन समझ गया कि भारत पर शासन बनाए रखने के लिए पर्याप्त यूरोपीय सैनिक भेजना संभव नहीं है..

पूना पैक्ट : टकराव की चरम सीमा

पूना पैक्ट के दौरान गांधी से आपकी बातचीत कैसी थी?

वे बताते हैं कि मैकडोनाल्ड द्वारा दिया गया award उनके सुझाव पर आधारित था– अलग निर्वाचन मंडल और सामान्य निर्वाचन में दूसरा वोट.. इससे प्रतिनिधित्व भी मिलता और अलगाव का आरोप भी नहीं लगता..

लेकिन गांधी स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं चाहते थे.. उन्होंने अनशन शुरू किया.. दबाव बढ़ा..

आंबेडकर ने समझौते का रास्ता सुझाया-

प्राथमिक चुनाव की अवधारणा के तहत यह प्रस्ताव रखा गया था कि अनुसूचित जातियाँ पहले अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चुना गया उम्मीदवार वास्तव में उन्हीं का प्रतिनिधि हो और उनकी आवाज़ को समझता हो.. इसके बाद वे चुने हुए प्रतिनिधि सामान्य चुनाव में भाग लें जहाँ पूरे निर्वाचन क्षेत्र की जनता मतदान करे..

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि इससे अनुसूचित जातियों को पहली बार राजनीतिक स्वायत्तता और आत्म-निर्णय का अवसर मिलता था..

उनके अनुसार-

बिना इस प्रक्रिया के प्रतिनिधित्व केवल नाममात्र का रह जाता क्योंकि उम्मीदवार अक्सर ऊँची जातियों या प्रभुत्वशाली वर्गों द्वारा तय कर दिए जाते थे

इसी दबाव और तर्क के चलते गांधी को इस व्यवस्था को मानना पड़ा– यह स्वीकारोक्ति इस बात का संकेत थी कि अनुसूचित जातियों की अलग राजनीतिक पहचान और उनके अधिकारों की माँग को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं रह गया था- हालाँकि बाद में इस मुद्दे पर तीखा मतभेद भी उभरा जिसने राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर गहरे वैचारिक टकराव को उजागर कर दिया..

आख़िरी बात-Ambedkar Gandhi BBC Interview

आपने उन्हें कभी महात्मा क्यों नहीं कहा?

आंबेडकर : क्योंकि वे उस उपाधि के योग्य नहीं थे- न राजनीति में/ न नैतिकता में.. वे एक राजनेता थे- बस राजनेता..

मेरा नजरिया ऑन Ambedkar Gandhi BBC Interview

क्या हम इतिहास को व्यक्तियों की पूजा से समझने की भूल कर रहे हैं जबकि असली समझ टकराव और असहमति में छुपी होती है?

मुझे लगता है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर का 1955 का BBC इंटरव्यू इसी भ्रम को तोड़ता है- यहाँ आंबेडकर “ महात्मा बनाम महानायक ” वाली बहस नहीं करते बल्कि सत्ता/ प्रतिनिधित्व और संरचना की बात करते हैं – जो आज भी उतनी ही relevant है।

मेरे नज़रिये से- इस इंटरव्यू की सबसे बड़ी ताकत इसकी unsentimental honesty है- आंबेडकर गांधी को न तो demonize करते हैं और न glorify – वे उन्हें एक राजनीतिक actor की तरह देखते हैं और शायद यही बात हमें uncomfortable करती है।

क्योंकि हमने इतिहास को moral binaries में पढ़ना सीख लिया है – अच्छा बनाम बुरा। जबकि असल राजनीति हमेशा grey होती है। Ambedkar Gandhi BBC Interview हमें यही सिखाता है कि नेताओं को समझने का सही तरीका यह देखना है कि वे किन संरचनाओं को मजबूत करते हैं और किन्हें कमजोर

अगर इसे आज के भारतीय संदर्भ से जोड़ें- तो मुझे यह ट्रेन और गाँव वाला उदाहरण बेहद powerful लगता है। मैंने देखा है कि शहरों में diversity, equality और inclusion की बातें बहुत आसानी से स्वीकार कर ली जाती हैं – office, metro, mall तक सब ठीक लगता है। लेकिन जैसे ही व्यक्ति अपने “native space” में लौटता है वही caste, वही hierarchy, वही silence वापस आ जाता है॥
यही वजह है कि आंबेडकर प्रतीकों से संतुष्ट नहीं थे- जैसे Temple entry, slogans या symbolic gestures – ये सब जरूरी हो सकते हैं लेकिन sufficient नहीं।

Balanced view की बात करूँ तो यह भी सच है कि गांधी ने mass mobilization की जो क्षमता दिखाई वह अपने आप में ऐतिहासिक थी। उन्होंने राजनीति को आम आदमी की भाषा दी। लेकिन आंबेडकर का सवाल ज़्यादा गहरा था

mobility without dignity का क्या फ़ायदा? Representation without power कितना meaningful है?

यहीं पर दोनों के रास्ते अलग होते थे – एक moral appeal पर भरोसा करता था और दूसरा constitutional safeguards पर॥

Future outlook की बात करें तो मेरे हिसाब से यह इंटरव्यू सिर्फ़ अतीत का दस्तावेज़ नहीं है बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी है। अगर हम आज भी equality को सिर्फ़ “visibility” तक सीमित रखेंगे और structural reform से बचते रहेंगे तो वही दोहरी मानसिकता बनी रहेगी – modern spaces में progress/ traditional spaces में stagnation

अंत में मेरा व्यक्तिगत विचार यही है कि इतिहास को समझना किसी को गिराने या चढ़ाने का खेल नहीं होना चाहिए
यह समझने का अभ्यास होना चाहिए – कि सत्ता कैसे काम करती है/ सुधार कहाँ रुक जाता है/ और असली बदलाव क्यों मुश्किल होता है।

शायद आंबेडकर हमें यही सिखाते हैं:

आदर्शों से नहीं बल्कि संरचनाओं से डरिए – क्योंकि वही समाज को बनाती भी हैं और बिगाड़ती भी

मुख्य निष्कर्ष-Ambedkar Gandhi BBC Interview

यह एक विरोधी की नज़र से देखा गया अनुभव है-

जहाँ आदर्श नहीं/ टकराव है

प्रतीक नहीं/ संरचना है

और व्यक्तित्व से ज़्यादा सत्ता की राजनीति है…

अगर यह बातचीत आपको सोचने पर मजबूर करती है then-

  • इसे Save करें
  • ऐसे archival narratives के लिए Follow करें
  • इतिहास को समझने वालों के साथ Share करें

Disclaimer-Ambedkar Gandhi BBC Interview

यह लेख केवल शैक्षणिक और ऐतिहासिक सूचना के उद्देश्य से है- इसमें व्यक्त विचार स्रोत पाठ में व्यक्त वक्ता के हैं

Sources of Information-Ambedkar Gandhi BBC Interview

यह लेख पूरी तरह प्रदान किए गए साक्षात्कार और उसमें व्यक्त व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है..Bhimrao Ambedkar’s iconic interview from 1955 – Archives – BBC News India..https://www.youtube.com/watch?v=Wf3VJCpNMqI

लेखक परिचय

Shaivam Trending Bharat टीम के Trending Topic Specialist हैं/….. उन्हें पिछले 10 वर्षों से ब्रेकिंग न्यूज़/राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाओं/ सामाजिक मुद्दों/Book Summeries और वायरल ट्रेंड्स को कवर करने का व्यावहारिक अनुभव है…वे कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु विद्यार्थियों को वर्षों से मार्गदर्शन और विषयगत ज्ञान प्रदान कर रहे हैं

Shaivam की विशेषज्ञता Topics को तेज़, सटीक और तथ्य-आधारित तरीके से प्रस्तुत करने में है… वे हर ट्रेंडिंग विषय को उसके सही संदर्भ.. बैकग्राउंड और भरोसेमंद जानकारी के साथ पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं…

ॐ नमः शिवाय

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