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बचपन से ही परमहंस योगानंद जी को लगता था कि उनका शरीर उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है
थोड़ी सी मेहनत, लंबी यात्रा या बस एक सामान्य दिन सब कुछ उन्हें थका देता था- वजन कभी नहीं बढ़ता था और पाचन इतना कमजोर कि दवाइयों और टॉनिक की कतार कमरे में किताबों से लंबी हो जाती और मन में एक सवाल घूमता रहता
“ क्या मैं कभी मजबूत बन पाऊँगा? ”
हीन भावना धीरे धीरे जड़ पकड़ रही थी॥ लेकिन तभी आश्रम में गुरु युक्तेश्वर जी की एक नजर ने वो कह दिया जो आगे चलकर विचारों की शक्ति का सबसे गहरा सबक बन गया
यहीं से कहानी मोड़ लेती है…
मुकुंद, तुम्हारी कमजोरी बाहर नहीं तुम्हारे विचारों में है

विचारों की शक्ति कैसे काम करती है?- गुरु का पहला सबक जो जीवन बदल देता है
गुरु युक्तेश्वर जी के ये शब्द योगानंद जी के लिए चौंकाने वाले थे योगानंद जी ने साफ कहा-
“ गुरुदेव बचपन से अपच है दवाइयाँ लेते लेते थक गया हूँ क्या सच में कभी ठीक हो पाऊँगा? ”
गुरु मुस्कुराए
“ दवाइयों की अपनी सीमा होती है लेकिन तुम अपनी बीमारी पर इतना विश्वास करते हो कि वही विश्वास तुम्हें कमजोर बनाए रखता है ”
यहीं से विचारों की शक्ति कैसे काम करती है
“शक्तिशाली विचारों पर विश्वास करो-सोचो कि तुम स्वस्थ हो- बलवान हो – और ये विचार मन में रोप दो- अचानक ही बदलाव आ जाएगा”
Table of Contents-विचारों की शक्ति कैसे काम करती है?
क्यों विचार और विचारों की शक्ति ही असली दवा हैं?

गुरु का संदेश बिल्कुल साफ था
शरीर मन का विस्तार है जैसा मन सोचता है शरीर वैसा ही जीता है
योगानंद जी को पहली बार महसूस हुआ कि उनकी सबसे बड़ी बीमारी अपच नहीं, हीन भावना थी लेकिन सवाल वही था- क्या सिर्फ सोचने से बदलाव आ सकता है?
गुरु ने जवाब दिया
“ सिर्फ सोचना नहीं पूर्ण विश्वास से दोहराना ”
गुरु युक्तेश्वर जी का अपना अनुभव- (जब विचारों की शक्ति ने बीमारी पैदा भी की और मिटाई भी)
युक्तेश्वर जी ने अपनी कहानी सुनाई वे दो महीने टाइफाइड से जूझ चुके थे बुखार उतरा लेकिन शरीर नाममात्र का रह गया वे अपने गुरु लाहिड़ी महाशय के पास पहुँचे
“ गुरुदेव शरीर टूट गया है साधना की ताकत ही नहीं बची ”
लाहिड़ी महाशय बोले-
“ युक्तेश्वर तुमने खुद को बीमार किया है। चिंता मत करो कल तक सब ठीक होगा ”
युक्तेश्वर जी ने पूरे दिन गुरु की शक्ति और अपने विश्वास पर भरोसा रखा अगली सुबह?
ऊर्जा की लहर थी और वे दौड़ते हुए गुरु के पास पहुँचे-
“ आपने मुझे ठीक कर दिया ”
गुरु मुस्कराए
“ आज ठीक हो लेकिन कल क्या होगा? ”
डर फिर पैदा हुआ और…अगले दिन बीमारी लौट आई- लाहिड़ी महाशय ने सिर्फ इतना कहा-
“Your thoughts did it again.”
विचारों की शक्ति कैसे काम करती है और इसका असर कितना तीव्र हो सकता है?

यह कहानी एक ही बात साबित करती है- एक दिन विश्वास = स्वास्थ्य सही हो गया जैसे ही दूसरे दिन डर फिर आया = बीमारी दोबारा से जाग गयी
गुरु का निष्कर्ष साफ था
“ शरीर मन से बना है मन के अधीन है ”
यही बात सुनकर योगानंद जी के भीतर एक समझ जागी-
“ अगर विचार बीमारी ला सकते हैं, तो विचार ही उसे मिटा भी सकते हैं ”
लाहिड़ी महाशय का चमत्कार-जब विचारों से 22 किलो वजन बढ़ गया
लाहिड़ी महाशय ने आगे कहा
“ युक्तेश्वर विश्वास से सोचो तुम स्वस्थ हो… बलवान हो ”
उसी दिन युक्तेश्वर जी को शरीर में ताकत महसूस होने लगी अगली सुबह उनकी माँ घबरा गई
“ बेटा शरीर सूज क्यों गया? ”
युक्तेश्वर जी हँसे
“ ये सूजन नहीं…वजन है ”
कुछ ही दिनों में उनका 22 किलो वजन बढ़ चुका था गुरु का उत्तर बस इतना था (की ये कैसे हुआ )
“ विचारों की शक्ति से ”
विचारों की शक्ति कैसे काम करती है? : फायदे और खतरे (गुरु की चेतावनी)

फायदे
- स्वास्थ्य में सुधार
योगानंद जी का अपच गायब हुआ – कभी वापस नहीं आया - मानसिक मजबूती
हीन भावना खत्म आत्मविश्वास जागृत - आध्यात्मिक उन्नति
जब मन मजबूत तो साधना सहज
खतरे
- गलत विश्वास = उल्टा असर
डर ने बीमारी वापस ला दी - अनुशासन की कमी
बिखरे विचार शक्ति को नष्ट करते हैं
गुरु की चेतावनी साफ
“ विचलित मन शक्ति बर्बाद करता है ”
विचारों की शक्ति कैसे काम करती है और इसे कैसे विकसित करें? गुरु के बताए 3 सरल कदम
एक शक्तिशाली विचार चुनिए
“ मैं स्वस्थ और मजबूत हूँ ” रोज़ 10 मिनट महसूस करते हुए दोहराइए
सचेत रहिए
विचार आएँ, जज मत कीजिए, अच्छे को बढ़ाइए बुरे को छोड़ दीजिए
कंसंट्रेशन अभ्यास
एक ही विचार पर टिके रहिए, गुरु कहते थे
“ कंसंट्रेशन से ऊर्जा एक दिशा में बहती है ”
गुरु की सबसे गहरी सीख
गुरु युक्तेश्वर जी ने कहा
“ The body is literally manufactured by the mind ”
विचार जितने तीव्र होंगे असर उतना तेज होगा /योगानंद जी ने इसे सिर्फ सुना नहीं जिया– और यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी विचारों की शक्ति कैसे काम करती है इसका सबसे जीवंत उत्तर है
मेरा नजरिया – विचारों की शक्ति कैसे काम करती है पर
ये सारी कहानी पढ़ने के बाद मेरे मन में सबसे पहला सवाल यही उठा – क्या हम सच में अपनी कमजोरी शरीर में ढूंढ रहे हैं, या अपने ही विचारों में?
परमहंस योगानंद जी और गुरु युक्तेश्वर जी का ये प्रसंग सिर्फ आध्यात्मिक कथा नहीं है- बल्कि आज के समय के लिए एक गहरी psychological reality भी है।
मेरा व्यक्तिगत नजरिया यह है कि विचारों की शक्ति कैसे काम करती है, इसे हम अक्सर या तो चमत्कार मान लेते हैं या पूरी तरह नकार देते हैं। जबकि सच्चाई इन दोनों के बीच है। मैंने खुद देखा है कि जिन लोगों की पहचान “मैं कमजोर हूँ”, “मुझसे नहीं होगा”, “मेरा शरीर साथ नहीं देता” जैसी सोच से बन जाती है, उनके फैसले, ऊर्जा और जीवन की दिशा भी उसी के अनुसार ढल जाती है- शरीर धीरे-धीरे उसी कहानी को सच मान लेता है।
Indian context में देखें तो यह और भी गहराई से जुड़ा है। हम बचपन से सुनते आए हैं -“तुम तो दुबले हो”, “तुम्हारी immunity कम है”, “तुम ये काम नहीं कर पाओगे” ये वाक्य मज़ाक में कहे जाते हैं, लेकिन धीरे धीरे belief system बन जाते हैं- योगानंद जी की हीन भावना भी कुछ ऐसी ही conditioning का परिणाम थी। गुरु युक्तेश्वर जी ने असल में बीमारी को नहीं उस belief को challenge किया
यह लेख यह नहीं कहता कि बीमारी सिर्फ सोच से ठीक हो जाती है या दवाइयों की जरूरत नहीं पड़ती – यह मेरा व्यक्तिगत विचार भी नहीं है। चिकित्सा विज्ञान की अपनी जगह है- लेकिन जो बात अक्सर miss हो जाती है वो यह कि डर, चिंता और निरंतर नकारात्मक विचार शरीर की healing process को कमजोर कर सकते हैं। वहीं सकारात्मक, स्थिर और भरोसेमंद विचार recovery को support कर सकते हैं।
लाहिड़ी महाशय और युक्तेश्वर जी की कहानी यह सिखाती है कि विचार neutral नहीं होते-
वे या तो शक्ति बनते हैं, या बाधा।
एक दिन का डर बीमारी लौटा सकता है, और एक दिन का गहरा विश्वास ऊर्जा वापस ला सकता है। यही वजह है कि विचारों की शक्ति को discipline की जरूरत होती है – बिना concentration के यह उल्टा भी असर कर सकती है।
आने वाले समय में spirituality और psychology का यह संगम और ज्यादा relevant होगा- लोग धीरे धीरे समझेंगे कि mindset wellness, physical wellness से अलग नहीं है। योगानंद जी की कहानी इसी दिशा में एक मजबूत संकेत है।
अंत में- ये मेरा व्यक्तिगत नजरिया है कोई चिकित्सीय या आधिकारिक सलाह नहीं। लेकिन एक सवाल आपसे छोड़ना चाहूंगा –
अगर आपके विचार रोज़ आपको कमजोर होने का संदेश दे रहे हैं तो क्या शरीर से मजबूत होने की उम्मीद करना न्यायसंगत है?
शायद असली शुरुआत वहीं से होती है – जहां हम अपने विचारों को पहचानना सीखते हैं…और उन्हें अपना भाग्य लिखने देते हैं, बीमारी नहीं।
लेखक: अरविंद
अरविंद एक अनुभवी आध्यात्मिक मार्गदर्शक और विशेषज्ञ सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियर हैं… जो जीवन के आंतरिक और बाहरी आधारों को जोड़ने का एक अनूठा दृष्टिकोण लाते हैं…
अनुभव एवं विशेषज्ञता:
- आध्यात्मिकता एवं ध्यान-: उन्हें ध्यान (मेडिटेशन) और आध्यात्मिक अभ्यास के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहन…व्यक्तिगत अनुभव प्राप्त है.. वे इस विषय पर पहले से ही प्रतिष्ठित संस्थाओं के लिए नियमित रूप से ज्ञानवर्धक लेख लिखते रहे हैं।
- सिविल इंजीनियरिंग-: उनके पास सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का सक्रिय व्यावहारिक अनुभव है/ जो निर्माण… परियोजना प्रबंधन…. गुणवत्ता नियंत्रण और रखरखाव जैसे पहलुओं को कवर करता है….
प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता:
Trending Bharat टीम के सदस्य के रूप में/ अरविंद अपने लेखन में जटिल आध्यात्मिक अवधारणाओं को आधुनिक/ व्यस्त जीवनशैली के साथ सामंजस्य बिठाते हुए/ उन्हें व्यावहारिक एवं सुलभ बनाते हैं… उनकी सिविल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि एक तार्किक, समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण प्रदान करती है… जिससे उनकी सामग्री विश्वसनीय और जमीन से जुड़ी रहती है.. उनका उद्देश्य पाठकों को ऐसा ज्ञान प्रदान करना है जो न केवल विचारोत्तेजक हो, बल्कि जीवन में उपयोगी भी हो..
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