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15 January 1990: Jab Osho Death Mystery Ne Naya Mod Liya
15 जनवरी 1990, दोपहर का समय, कोरेगांव पार्क, पुणे। सर्दियों की हल्की धूप आश्रम की शांत पगडंडियों पर बिखरी हुई थी। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य प्रतीत होता था, लेकिन आश्रम की दीवारों के भीतर एक ऐसा रहस्य आकार ले रहा था, जिसकी चर्चा आज भी ओशो के अनुयायियों और शोधकर्ताओं के बीच होती है। यह वह समय था जब ओशो का शरीर तेजी से कमजोर हो रहा था।
कभी हजारों लोगों के सामने घंटों तक बोलने वाला यह व्यक्ति अब दिन के बीस घंटे से भी अधिक समय विश्राम में बिताने लगा था। उनके निकट सहयोगियों के अनुसार, वे अपनी शेष ऊर्जा केवल बुद्ध हॉल में होने वाले संक्षिप्त प्रवचनों के लिए बचाकर रख रहे थे। लेकिन इस शारीरिक गिरावट के पीछे क्या केवल बीमारी थी, या फिर कोई ऐसी अदृश्य शक्ति काम कर रही थी जिसे समझ पाना सामान्य मनुष्य के लिए असंभव था?
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Dhvani Kiranon Ka Daava: Osho Death Mystery Ka Sabse Vivadit Hissa
उसी दिन ओशो के निजी दंत चिकित्सक स्वामी देवगीत को अचानक संदेश मिला कि ओशो उनसे मिलना चाहते हैं। जब वे डेंटल रूम में पहुँचे, तो उनके सामने बैठा व्यक्ति वही ओशो था, लेकिन शरीर मानो अपनी अंतिम सीमाओं तक पहुँच चुका था। चेहरा शांत था, आँखें पहले की तरह गहरी थीं, किंतु शरीर अत्यंत दुर्बल दिखाई दे रहा था। इसी मुलाकात के दौरान ओशो ने एक ऐसा दावा किया जिसने आने वाले वर्षों में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए।
उनके अनुसार उनके शरीर पर कुछ लोगों द्वारा रहस्यमयी ध्वनि किरणों से हमला किया जा रहा था। उन्होंने बताया कि संभवतः दो पुरुष और एक महिला विशेष प्रकार की ध्वनि तरंगों को केंद्रित करके उनके शरीर को निशाना बना रहे थे। उनका विश्वास था कि यही वे लोग थे जिन्होंने वर्षों पहले अमेरिका में उन्हें विष देकर नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया था। अब, जब वह प्रयास सफल नहीं हुआ, तो हमला एक नए और कहीं अधिक अदृश्य रूप में किया जा रहा था।
ओशो ने कहा कि प्रारम्भिक प्रयास उनके मन पर केंद्रित थे, लेकिन उनका दावा था कि वे मन की सीमाओं से परे पहुँच चुके हैं। इसलिए हमला उनके चेतन स्तर पर प्रभाव नहीं डाल पाया। इसके बाद लक्ष्य उनका शरीर बना। विशेष रूप से यकृत के आसपास होने वाले असहनीय दर्द का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपने शरीर के भीतर की स्थिति जानने की इच्छा व्यक्त की। उपलब्ध साधन सीमित थे। डेंटल एक्स-रे मशीन सामान्यतः दाँतों और जबड़ों की तस्वीर लेने के लिए बनी थी। फिर भी प्रयास किया गया। बड़ी फिल्म लगाई गई, मशीन को संशोधित करने की कोशिश हुई और तस्वीर ली गई। लेकिन परिणाम धुंधला था। कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। रहस्य वहीं का वहीं बना रहा।
आश्रम के वातावरण में उन दिनों एक विचित्र बेचैनी फैल चुकी थी। कुछ लोगों का मानना था कि ओशो का स्वास्थ्य अमेरिका में कथित विषाक्तता के कारण बिगड़ा था। कुछ इसे सामान्य चिकित्सकीय कारणों से जोड़ते थे। वहीं कुछ अनुयायी ध्वनि किरणों और अदृश्य आक्रमण की संभावना को गंभीरता से लेते थे। विज्ञान के पास इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई प्रमाण नहीं था, लेकिन आश्रम के भीतर यह विषय धीरे-धीरे एक फुसफुसाहट से बढ़कर एक गहरे रहस्य का रूप ले चुका था।
19 January 1990: Osho Ke Antim Pal
फिर आया 19 जनवरी 1990 का दिन। समय था शाम लगभग साढ़े चार बजे। आश्रम के भीतर सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन कुछ ही मिनटों में इतिहास बदलने वाला था। अचानक संदेशवाहक तेजी से विभिन्न सदस्यों को बुलाने लगे। वातावरण में घबराहट थी। किसी को पूरी बात नहीं बताई जा रही थी, लेकिन हर व्यक्ति समझ रहा था कि कुछ असाधारण घटित हो चुका है। इनर सर्कल के सदस्य कृष्णा हाउस की ओर बढ़ने लगे। जब सभी एकत्र हुए, तब वहाँ मौजूद चेहरों पर तनाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
कुछ ही देर बाद वह घोषणा हुई जिसने हजारों अनुयायियों की दुनिया बदल दी। ओशो ने अपना शरीर छोड़ दिया था। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं, लेकिन उस कमरे में समय मानो ठहर गया था। कुछ लोग स्तब्ध थे, कुछ की आँखों में आँसू थे, और कुछ अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि जिस व्यक्ति की उपस्थिति पूरे आश्रम का केंद्र थी, वह अब भौतिक रूप में उनके बीच नहीं था। उसी क्षण उनके अंतिम संस्कार और अंतिम यात्रा की तैयारियाँ प्रारम्भ हुईं। यह केवल एक आध्यात्मिक गुरु की विदाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसे रहस्य की शुरुआत भी थी जिसका उत्तर आज तक किसी के पास नहीं है।
क्या वास्तव में कोई गुप्त ध्वनि तकनीक अस्तित्व में थी? क्या यह अत्यधिक शारीरिक पीड़ा और गिरते स्वास्थ्य की एक आध्यात्मिक व्याख्या थी? या फिर यह उन घटनाओं का परिणाम था जो वर्षों पहले अमेरिका में घटित हुई थीं? इतिहास, चिकित्सा विज्ञान और आध्यात्मिक परंपराएँ आज भी इस प्रश्न पर एकमत नहीं हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि ओशो के अंतिम दिनों से जुड़ी यह कहानी आधुनिक आध्यात्मिक इतिहास के सबसे रहस्यमय अध्यायों में से एक बन चुकी है।
“19 जनवरी 1990 की उस शाम के साथ एक युग समाप्त हो गया। लेकिन उनके अंतिम दिनों से जुड़े प्रश्न आज भी जीवित हैं। क्या यह केवल गिरते स्वास्थ्य की कहानी थी, या फिर उस रहस्य के पीछे कुछ और छिपा था? समय बीत गया, गवाह बदल गए, लेकिन उत्तर आज भी धुंध में खोया हुआ है।”
Disclaimer
“ओशो का मानना था कि उन पर रहस्यमयी ध्वनि किरणों द्वारा हमला किया जा रहा है। हालांकि इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।”

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